Funny Stories For Kids In Hindi | Hindi Story For Kids

Funny Stories For Kids In Hindi | Hindi Story For Kids : “बच्चों के लिए मज़ेदार कहानियाँ” के साथ बच्चों को हँसी और कल्पना की दुनिया में ले जाती है। जिससे हर बच्चे के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। शरारती बंदरों से लेकर सुपरहीरो तक, ये कहानियाँ मज़ेदार और रोमांच से भरी हैं जो आपको हँसाएँगी।

नींद की कहानियाँ एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं बच्चों की परवरिश और उनकी मनोहारी दुनिया में संतुष्टि के लिए। ये कहानियाँ रात के समय बच्चों को सुलाने के लिए सुनाई जाती हैं और उनके सपनों में चमत्कारिक रूप से जीवित हो जाती हैं।

बच्चे कहानी सुनना और पढ़ना बहोत अच्छा लगता है। नैतिक कहानियां, डरावनी नी कहानियांबच्चों के लिए मज़ेदार कहानियाँसुपर हीरो की कहानियांरात को सोने से पहले सुननेवाली कहानियांछोटे बच्चो की कहानियां ओर भी कई तरह की कहानियां होती है। जो बच्चो को अच्छी लगती है।

Funny Stories For Kids In Hindi | Hindi Story For Kids

बच्चे कहानी सुनना और पढ़ना बहोत अच्छा लगता है। नैतिक कहानियां, डरावनी नी कहानियां, सुपर हीरो की कहानियां, रात को सोने से पहले सुननेवाली कहानियां, छोटे बच्चो की कहानियां ओर भी कई तरह की कहानियां होती है। जो बच्चो को अच्छी लगती है।

Funny Stories For Kids In Hindi | Hindi Story For Kids
Funny Stories For Kids In Hindi | Hindi Story For Kids

1. दो विद्वानों की कहानी | Funny Story For Kids In Hindi

दो विद्वानों की कहानी | Funny Story For Kids In Hindi
दो विद्वानों की कहानी | Funny Story For Kids In Hindi

बहुत पुरानी बात है एक गाँव में दो लड़के रहते थे | एक का नाम ज्ञानवान और दूसरे का नाम बुद्धिमान था लेकिन दोनों पढने-लिखने में बहुत कमजोर थे | दोनों के माता-पिता उनको लेकर बहुत परेशान थे , उन्होंने ज्ञानवान और बुद्धिमान को अच्छी शिक्षा देने के लिए वनारस भेज दिया | ज्ञानवान और बुद्धिमान ने वनारस में कुछ वर्ष रहकर अध्ययन किया अब दोनों ही अच्छी शिक्षा ग्रहण कर विद्वान हो चुके थे।

विद्वान होने के सांथ ही उनमें इस बात का घमण्ड भी आ गया था कि वे बहुत विद्वान हैं | हर जगह दोनों ही अपने को अधिक श्रेष्ठ और दूसरे को नीचा दिखलाने कर प्रयत्न करते थे | दोनों को कई वार उनके शिक्षकों ने इस वारे में समझाया किन्तु दोनों अपने को ही श्रेष्ठ समझते थे।

शिक्षा खत्म होने के बाद दोनों को वनारस से अपने गाँव वापस लौटना था | रास्ता बहुत लंबा था चलते-चलते उन्हें रात हो गई और उन्होंने एक गाँव में अपना डेरा डाला | गाँव के जमींदार को पता चला कि उनके गाँव में वनारस के विद्वान आये हुए हैं | जमीदार साहब ने दोनों विद्वानों को रात्री विश्राम और भोजन के लिए अपने घर आमंत्रित किया | ज्ञानवान और बुद्धिमान दोनों जमीदार के घर आ गए।

जमींदार ने दोनों के रुकने की अलग-अलग व्यवस्था की और स्वादिस्ट पकवान बनवाये | जमींदार पहले ज्ञानवान के पास गया और हालचाल जाना | जमींदार पहले तो ज्ञानवान से बहुत प्रभावित हुआ किन्तु अपने घमण्ड और बुद्धिमान को नीचा दिखाने के लिए ज्ञानवान जमींदार से बोला- ” बुद्धिमान तो नाम का बुद्धिमान है इतने दिन वनारस में रहकर भी वह कुछ नही सीखा और अभी भी गधा ही है।”

ज्ञानवान की बाते जमींदार को अच्छी नहीं लगी | ज्ञानवान से मिलने के बाद वह बुद्धिमान से मिलने गया |बुद्धिमान में भी ज्ञानवान की तरह ही बातें की और कहा- ” ज्ञानवान को कोई ज्ञान नहीं है और वह तो बैल है जिसे कुछ नहीं आता।”

जमींदार दोनों से बहुत निराश हुआ और कुछ देर पश्चात उसने ज्ञानवान और बुद्धिमान को भोजन के लिया बुलाया | दोनों भोजन के लिए आये और जब दोनों को थालियाँ परोसी गईं तो थाली में घास और भूंसा था। थालियाँ देखकर दोनों जमींदार पर बहुत क्रोधित होते हुए बोले – ” आपने यहाँ हमें बेज्जत करने के लिए बुलाया है। क्या हम कोई जानवर है जो आप-हमें भूसा और घास खिला रहे हैं ?

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जमींदार हाथ जोड़कर बोला- ” मान्यवर ! आप विद्वान है और मेरे मेहमान है। मेरा उद्देश्य आपके बेज्जती करना नहीं है आप दोनों ही विद्वान होकर एक दूसरे को बैल और गधा बोल रहे थे इसीलिए बैल और गधे का जो भोजन पसंद है मैंने आपको भी वाही भोजन परोस दिया।”

जमींदार की बात सुनकर ज्ञानवान और बुद्धिमान को अपनी गलती का एहसास हुआ और दोनों ने एक दूसरे से क्षमा मांगी और जमींदार को धन्यवाद दिया | जमींदार ने भी दोनों को स्वादिस्ट पकवान खिलाये और दोनों की खूब आव-भगत किया।

शिक्षा- कोई कितना ही बड़ा विद्वान क्यूँ ना हो अगर दूसरे को नीचा दिखलानेका प्रयत्न करता है तो उसे भी नीचा देखना पड़ता है।

2. हाथी और दरजी की कहानी | Hindi Story For Kids

हाथी और दरजी की कहानी | Hindi Story For Kids
हाथी और दरजी की कहानी | Hindi Story For Kids

एक समय की बात है एक कस्बे में एक दर्जी रहता था। दर्जी बहुत ही दयालु और अच्छे स्वभाव का इंसान था। आसपास के सभी लोग उसी से अपने कपड़े सिलवाते थे। एक दिन कहीं से एक हाथी आया और दर्जी के पास आकर खड़ा हो गया। हाथी को अपने पास खड़ा देखकर दर्जी ने खाने के लिए कुछ फल हाथी को दे दिए । फल खाकर हाथी बहुत खुश हुआ और वहां से चला गया।

दूसरे दिन हाथी फिर दरजी के पास आकर खड़ा हो गया । दरजी समझ गया की हाथी को फल खाना है । दरजी ने फिर कुछ फल हाथी को दे दिए । हाथी इस बार भी फल खाकर वापस चला गया ।

अब हाथी प्रतिदिन दर्जी के पास आता और उसकी दुकान के सामने खड़ा हो जाता। दर्जी उसे कुछ फल दे देता जिन्हें खाकर वह वापस चला जाता था । यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा । एक दिन दर्जी को कुछ जरूरी काम आ गया जिससे उसे बाहर जाना पड़ा । बाहर जाने के पहले दर्जी दुकान पर अपने लड़के को बैठा गया और उसे कुछ फल दे दिए और जाते-जाते बोल गया कि जब भी हाथी आए तो उसे यह फल खिला देना।

लड़के ने अपने पिता की बात में हामी भर दी । दर्जी का लड़का बहुत शरारती था उसे एक शरारत सूझी । उसने फल पहले ही खा लिए और जब हाथी दुकान पर आया और फल खाने के लिए जैसे ही सूंड आगे बढ़ाई दरजी के लड़के ने उसकी सूंड में सुई चुभो दी। सुई लगने से हाथी की सूंड में तेज दर्द हो रहा था। दर्द से राहत पाने के लिए हाथी नदी की तरह भागा। नदी पहुंचते ही हाथी ने नदी में अपनी सूँड़ डाल दी, जिससे उसे काफी राहत मिली।

हाथी गुस्से से आग-बबूला हो रहा था और किसी भी तरह दर्जी के लड़के से बदला लेना चाहता था। हाथी ने नदी में स्नान किया और अपनी सूंड मे कीचड़ भरकर वापस दर्जी की दुकान की ओर चल पड़ा। हाथी दोबारा दर्जी की दुकानपर पहुंचा।

दरजी लड़का दुकान पर ही बैठा हुआ था। हाथी ने फिर अपनी सूंड आगे की बढाई , दरजी का लड़का समझा की हाथी फल मांग रहा है , उसने सुई उठाकर जैसे ही हाथ आगे बढ़ाया हाथी ने अपनी सूँड़ में भरी हुई सारी कीचड़ दर्जी के लड़के के ऊपर डाल जी जिससे दर्जी का लड़का पूरा कीचड़ में खब गया साथ ही दुकान में रखे हुए कपड़े भी खराब हो गए।

जब दर्जी लौटकर दुकान आया तो अपनी दुकान की हालत देखकर लड़के से सारा माजरा पूछा लड़का बोला – ” ये कीचड़ आपका हाथी सूंड में भरकर लाया था और मेरे ऊपर डालकर सारी दुकान को खराब कर गया। ”

दर्जी को लड़के की बात पर विश्वास नहीं हुआ उसने जब लड़के से सख्ती से पूछ्ताछ की तो लड़के ने सारी बात बतला दी। दर्जी अपने लड़के को लेकर उस स्थान पर गया जहाँ हाथी रहता था। दर्जी ने प्यार से हाथी को सहलाया और उससे कुछ फल खाने के लिए दिए । दर्जी ने अपने लड़के को बुलाया और उसके हाथों भी से कुछ फल हाथी को दिलवाए । फल खाकर हाथी का गुस्सा शांत हुआ और उसने दरजी के लड़के को क्षमा कर दिया फल खाकर हाथी का गुस्सा शांत हुआ । दर्जी के लड़के और हाथी की भी दोस्ती हो गई। अब हाथी दर्जी के लड़के को अपने पीठ पर बैठाकर घूमाने के लिए ले जाने लगा।

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शिक्षा- ” दर्जी और हाथी की कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कभी भी किसी के साथ गलत व्यवहार नहीं करना चाहिए। ”

3. धोबी और जादुई गधा ढेंचू

बहुत साल पहले डमरु नगर गांव में सखाराम नाम का एक धोबी रहता था। वह बड़ा ही मेहनती था। गांव के लोगों के कपड़े धोता और पैसे कमाता था। उसके पास ढेंचू नाम का एक गधा था, जो बड़ा ही आलसी था जब उसका मन अपनी पीठ पर कपड़ों का बोझ लादकर नदी पर जाने का नहीं होता, तो वह कहीं ना कहीं भाग जाता था।

सखाराम बड़ा परेशान होता क्योंकि उसे कपड़े धोने के लिए नदी पर ही जाना पड़ता था नदी उसके घर से दूर थी उसे कपड़े उठाकर जाने में बड़ी तकलीफ होती थी।

वह अपने गधे ढेंचू को प्यार से भी समझाता मारकर भी समझा था लेकिन ढेंचू ने तो जैसे कसम खा रखी थी कि उसे कुछ भी नहीं सुनना बस चारा खाता और सोता। काम करने का तो उसका दिल ही नहीं करता था।

ढेंचू सखाराम के पिता के समय से उसके घर में था। सखाराम उसे अपने भाई की तरह प्यार करता था। लेकिन वह ढेंचू के आलस से बहुत ही परेशान हो चुका था, एक बार तो पूरे हफ्ते सखाराम को अपने सर पर कपड़ों का बोझ लेकर नदी तक जाना पड़ा। उस दिन सखाराम ने निश्चय कर लिया कि अब तो वह ढेंचू को बेच देगा और उन पैसों से दूसरा गधा लाएगा। जो उसकी काम में मदद करें।

सखाराम ने गांव के कई लोगों से यह बात कही कि वह अपने गधे ढेंचू को बेचना चाहता है लेकिन गांव के लोग यह जानते थे कि सखाराम का गधा कितना आलसी है। इसलिए गांव का कोई भी व्यक्ति उस आलसी गधे को खरीदने के लिए तैयार नहीं हुआ।

सखाराम ने आसपास के गांव के लोगों से भी इस बारे में कहा लेकिन ढेंचू के आलस की चर्चा सब जगह फैल चुकी थी। एक दिन सखाराम और ढेंचू को नदी से घर वापस आने में देर हो गई थी। रास्ते में उन्हें डाकू मिल गए डाकुओं ने सखाराम को पकड़ लिया और सखाराम से कहा तुम्हारे पास जो कुछ भी है वह सब हमें दे दो।

सखाराम ने कहा, “डाकू महाराज मैं तो एक गरीब धोबी हूं मेरे पास आपको क्या मिलेगा।”

डाकुओं ने कहा, “हमने तुम्हारी और तुम्हारे गधे की चर्चा सुनी हुई है गांव और आसपास के लोग तुम्हारी और तुम्हारे गधे के बारे में बातें करते हैं। तुम्हारे पास कुछ तो ऐसा होगा जिसकी वजह से सभी तुम्हारे बारे में बात करते हैं।”

अब सखाराम सोचने लगा, “अगर मैंने इन लोगों से यह कहा कि मेरा गधा आलसी है लोग इस वजह से चर्चा करते हैं तो इन्हें मेरी बात पर यकीन ना होगा और यह मुझे मार देंगे।”

फिर सखाराम ने कहा, “आप ने हमारी चर्चा किस बारे में सुनी है।” तभी एक डाकू बोला, “मूर्ख चर्चा तो बड़े लोगों की होती है बड़े साहूकारों की जिन के पास रुपये पैसे हो। गरीबों के बारे में बात कौन करता है।”

यह सुनकर सखाराम को एक उपाय सूझा उसने फिर उन डाकुओं से कहा, “डाकू महाराज लोग तो ऐसे ही बातें करते रहते हैं मैं तो एक गरीब धोबी हूं मेरे पास आपको क्या मिलेगा आप चाहे तो मेरी तलाशी ले सकते हैं।”

डाकुओं ने सखाराम की तलाशी ली लेकिन उसके पास तो सच में कुछ नहीं था तो उन डाकुओं को क्या मिलता। तभी एक डाकू ने सरदार से कहा, “इस के पास जो मूल्यवान चीज़ है इसने कहीं छुपा कर रखा है यह हर वक़्त उसे साथ में लेकर नहीं घूमता होगा।”

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डाकुओं के सरदार ने सखाराम को ऊंची आवाज में कहा, “तुम सीधे-सीधे हमें बताते हो या हम तुम्हें मार दें।” सखाराम ने सरदार डाकू का पैर पकड़ लिया और कहा, “सरदार आप मुझे मत मारिए, मैं बताता हूं मेरे पास तो ले देकर सिर्फ एक यह जादुई गधा ही है लेकिन यह कोई ऐसा वैसा गधा नहीं है महाराज। अमावस्या की रात को ठीक 12 बजे आप नहा धोकर अपने भगवान को प्रणाम कर इस गधे की पूजा करें और फिर इस से जो चाहे वह मांग ले। यह गधा सब कुछ देता है।

डाकुओं के सरदार ने कहा, “तुम्हें यह गधा कहां से मिला?” सखाराम ने कहा, “यह गधा मुझे मेरे पिताजी ने दिया था।” डाकुओं के सरदार ने कहा, ठीक है अब से तुम्हारा यह गधा हमारा हो गया।

ये सुनकर तुरंत सखाराम ने कहा,”नहीं महाराज अगर आप यह गधा छीन कर ले जाएंगे या जबरदस्ती ले जाएंगे तो यह आपके किसी काम का नहीं होगा। आपको अपना सारा धन इस गधे के बदले में देना होगा तभी यह गधा आपको वरदान देगा, नहीं तो आपको कुछ भी नहीं मिलेगा।”

डाकू लालच में आ गए उन्होंने कहा, “ठीक है तुम यहीं रुको हम जाकर अपना सारा धन लेकर आते हैं।” ऐसा कहकर डाकू सखाराम को और उसके गधे ढेंचू को वहीं छोड़कर अपना सारा पैसा लेने चले जाते हैं।

सखाराम बड़ा खुश हो जाता है कि कहां तो वह इस ढेंचू को कम कीमत में भी बेचने को तैयार था। लेकिन अब उसे ढेंचू के बदले में बहुत सारा पैसा मिल जाएगा। वो ढेंचू से कहता है, “अब तुम्हें भी समझ आएगा जब यह डाकू तुम्हें ले जाएंगे और अमावस्या के दिन तुम उनकी इच्छा पूरी नहीं कर पाओगे, तो यह तुम्हें बहुत मारेंगे और मैं तो सारा धन लेकर शहर चला जाऊंगा।”

ढेंचू मन ही मन सोचता है, “यह कितना दुष्ट है ये मुझे इन दुष्ट डाकुओं के हाथ बेच कर इतना पैसा लेकर भाग जाने की बात कर रहा है।”

ढेंचू सोचता हैं और मन में बोलता है, “सखाराम तुझे तो मैं अभी भी नहीं छोडूंगा।” तभी डाकू अपना सारा लूटा हुआ धन लेकर वापस आते हैं। और सखाराम से कहते हैं, “यह लो हम अपना सारा धन ले आए हैं अब तो इस गधे का वरदान हमारे लिए काम करेगा हम जो चाहेंगे यह हमें देगा?”

सखाराम बोलता है, “हां सरदार जरूर देगा” ऐसा बोलकर वह सारा धन लेता है और डाकुओं के सामने कहता है, “इसका ख्याल रखना मैं इसे अपने भाई की तरह मानता हूं और जाने से पहले इस के गले मिलना चाहता हूं।” डाकू भी सोचते हैं कि इस गधे ने सखाराम को बहुत कुछ दिया होगा। तभी आज सखाराम इसे छोड़कर जाने में इतना दुखी हो रहा है।

सखाराम गधे के गले लगता है और उसके कान में कहता है, “तूने मुझे जितना दुखी किया है अब उन सब दुखों का हिसाब तुझे पूरा करना पड़ेगा” जब सखाराम ढेंचू के गले लग कर उसके कान में यह बात कह रहा होता है। तो ढेंचू सखाराम के पैसे की पोटली में अपने दांत से छेद बना देता है और मन में सोचता है मेरे रहने से तु दुखी था अब मेरे जाने से तो, तू और भी दुखी होगा।

डाकू ढेंचू को अपने साथ लेकर चले जाते हैं। और सखाराम खुशी-खुशी अपने पैसे की पोटली को लेकर अपने घर की तरफ चल देता है। लेकिन जब तक सखाराम घर पहुंचता है उसके पैसे की पोटली से थोड़ा-थोड़ा करके सारा धन रास्ते में गिर गया होता है।

यह देखकर सखाराम जोर जोर से रोने लगता है और कहता है, “मेरी तो किस्मत ही खराब थी गधा मिला तो ऐसा कि मुझसे ही काम कराता था और पैसा मिला तो ऐसा कि घर तक भी नहीं आ पाया।”

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